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काश मैं पंछी होती


काश मैं पंछी होती उड़ती दूर गगन में।
और चहकते हुए जा बैठती किसी चमन में।।

उड़ उड़ कर देखा करती नदिया झील समंदर।
एक टक निहारा करती झरनों का वह झर झर।
कुदरत का नूर समाया है इनके ही झरन में।


काश मैं पंछी होती उड़ती दूर गगन में।

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पंख पसारे उड़ती मैं भी पवन के संग फर फर।
चाहत होती उड़ कर छू लूं नीले नीले अंबर।
कितना मजा आता साथियों के संग उड़न में।।


काश मैं पंछी होती उड़ती दूर गगन में।


ऊंच नीच का भेद ना होता मिलजुल कर हम रहते।
एक ड़ाल पर बैठ सभी मिलकर कलरव करते।
इन्सानो को यह बतलाते कुटिलता नहीं है मन में।


काश मैं पंछी होती उड़ती दूर गगन में।


जग की कोलाहल से बचकर रहती दूर ही दूर।
ना रहती झंझट में किसी का होकर के मजबूर।
दूषित धूल धुआँ ना रहते मेरी जहन में।


काश मैं पंछी होती उड़ती दूर गगन में।
और चहकते हुए जा बैठती किसी चमन में।
काश?

                                                                                                   केवरा यदु "मीरा"
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