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आँसू



आखों में सागर आँसू के कब तलक हम इसे छुपायें।
अपने ही बेगाने हो गये किसको  अपना मीत बनायें।।


लिये कटोरा हाँथ में बचपन चौराहे पर फिरता हो।
नंगे बदन धूप या गर्मी बरसातों में घिरता हो।
कैसा बचपन मेरे देश का कैसे हम बचपन बचायें।। आँखों में....


बाप बेचारा बेबस है वह  चलने को लाचार हुआ।
बैसाखी अब बना सहारा  हमदर्द न कोई तैयार हुआ।
कांधे से हाँथ हटाया बेटे ने कैसे हम आँसू छुपायें।। आँखों में....




मंदिर जा भगवान के आगे छप्पनभोग लगाते हैं।
घर में बैठी,जन्मदात्री ,दो रोटी को तरसाते हैं।
वृद्धआश्रम में माँ बाप तड़पते कैसे अपना दर्द छुपायें।।आँखों में.....


बहन बेटियाँ नहीं सुरक्षित देख देख मन रोता है।
रक्षक ही भक्षक बन जाये पाप को कैसे बोता है।
अभिशापित सी दुबकी फिरती आँसू अब रोक न पायें।। आँखों में.....


धरती पुत्र किसान धरा पर सपनों को वह बोता है।
सूखा कभी बाढ़ के मारे अन्नदाता ही रोता है।
फाँसी के फंदे ,झूले तो फिर आँसू को कहाँ बचायें।।आँखों में.....


जब दहेज़ की बलि बेदी पर बेटी धू धू जलती है।
और कोख में आई बेटी  अजन्मी ही मरती है।
तुम्ही बताओ  बहते आँसू को हम कहाँ तलक छुपायें।।आँखों में......

                                                                                                  केवरा यदु "मीरा"राजिम(छ॰ग)
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