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जय रानी माँ

पांच कोष दुरिहा,छुरा ले पड़थे गाँव।
मलेवा के खालहे मे,मुढ़ीपानी हे नाव।

इही पहाड़ के उप्पर ,विराजे हे माता रानी।
इही ल जगदम्बा कथे,इही ल कथे भवाणी।

बिकट बढ़िया लगथे ,जायले जंगल कांटी मे।
हनुमान ह पहिली मिलही,खड़े हे मुहांटी मे।

चईत अउ कुवांर बढ़िया,जलथे इहां जोत।
दरशन बर जाथन सब,न ढेर करन न ओत।

सरर सरर हावा इहां,चलत रथे हर बेरा मे।
नाचे कुदे कस लागत रथे,दाई के ये डेरा मे।

खुशी इहां सब ल देहे,छप्पर फाड़ के दाई ह।
मनखे ल कोन काहे ,हांसत रथे रुख राई ह।

चिरई मन चहकत रथे,दाई के गुणगान ल।
जस गीत सुने असन,लागत रथे कान ल।

बेन्दरा तको कुदत रथे , ये रुख ले वो रुख मे।
सुख बढ़िया झलकत रथे,सबो जीव के मुख मे

भक्ति के नशा मे,सब जाथन झुमरत झुमरत।
लईकामन मटकात जाथे,सियान मन सुमरत।

इही ल कथे केरा पानी , पानी के इहां सेत हे।
हरियर हरियर केरा पेंड़,जइसे केरा के खेत हे।

इही  हमर दाई ददा,अउ इही हमर भगवाने।
जय माता बोलत रथन,इहीच हमर जबाने।

इही हमर मथुरा कांशी,अऊ इही जगन्नाथ।
इही हमर  बैष्णोदेवी, नवाथन अपन मांथ।

मिले हे हमला घर बईठे,सबो तिरथ धाम।
भाव भक्ति के होथे इहां,सबो हमर काम।

दुख अपन भगायबर,अउ जिनगी करेबर हरियर।
बिन ढेरियाय पहाड़ चड़थन,धर के फुल नरियर।

ये कविता  लिखत हों मे ,दाई के सुन्दर सेवा मे।
भूल चूक ल क्षमा करही,बहूँत जस हे मलेवा मे।

                        
                                                                  संतोष कुमार साहू
                                                                     रसेला(छुरा)
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