हे युवा ऐसा कर अपने कर्म से,
की सारा मनोरम दृश्य आ तरसे।
प्रेम बरसे , बरसे संस्कार पवन से,
फुल सितारों सी यही हो।
पंछीओ की मधुर धुन हो,
तेरे सीने में यही जूनून हो।।
हे युवा खुश मत होना नारे से,
विजय-विजय की तिलक हो अंगारे से।
घोर निशा में सुरज की लाली जाते तारों से,
विश्व में भारत समृद्ध वतन हो।।
पंछीओ की मधुर धुन हो,
तेरे सीने में यही जूनून हो।।
हे युवा तु कायर नहीं देखा मैंने इतिहास से,
सबक दे दुश्मनों को तलवार की धार से।
ये जाति धर्म की भेद उखाड़ फेंक दुनिया की राह से,
जाति तेरी मानव हो , धर्म तेरी मानवता।।
भारत की माटी तन मन हो,
तेरे सीने में यही जूनून हो।।।।।
रचना
- विशेसर नागेश
शा.पं.श्याम शकंर मिश्र
महाविद्यालय देवभोग (छ.ग.)
