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मंद के कविता


मउहा मंद सबले बड़े गँउहा डोमी साँप।
बहूँत जादा जहरा हरे नाव सुनके काँप।।

देशी मंद नांग हरे अउ नांगिन हरे अँग्रेजी।
दोनो के जहर कम नईये बहूँत हाबे तेजी।। 

मनखे एकर मेचका हरे पकड़ लेथे झट ले।
उने नही न गुने नही लील देथे गटा गट ले।।

बिनाश एकर रद्दा हरे सुख शांति ह बीला।
एकझन ल चाबीस ताहन रोतरा मई पीला।।

लड़ई झगरा एकर मूड़ी पूछी रिस घुस्सा रंग।
नियतखोरी के जोखी चढ़े छूटे नही कहूँ अंग।।

जउन जउन ल चाबे हे नी लहे फूँका झारा।
सब चीज ल खा के बने देंहे ल बनाथे चारा।। 

सलमील सलमील करत रथे दिन अउ रात मे।
सबले जादा फेन ल काटथे छठ्ठी अउ बरात मे।।

काकरो घर  जायबर  होगे  बनके  कहूँ सगा।
फरक नई खाय मिल जही साँप के तोला जगा।। 

लोक लाज मान गउन सबमे कोड़थे भिंभोरा।
बचके सबला रहना चाही पिटतहों ढिंढोरा।।



                             संतोष साहू
                            अलकरहा कवि
                        रसेला(छुरा) गरियाबंद छ0 ग0 
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