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बेटी

 
दाई ददा के सुख के,बेटी हरे अधार।
बिन बेटी के घर हरे,रतिहा कस अँधियार।।

दाई ददा के हियाव,बेटी हरे परान।
बिन बेटी दाई ददा,आधा मरे समान।।

चल दाई भात खाबे,ददा तहूँ खा भात।
खाय कस सवाद लागे,बेटी के हर बात।।

तिपन नई दे पेट मुड़,अइसे करे सेवा।
बेटी बर दाई ददा,सबले बड़े देवा।।

हरइया हरे बेटी ह,दाई ददा के दुख।
सब जोखा के फर फरे,अइसन हरे ये रुख।।

रोवत ल हँसावाय के,उदिम जाने बेटी।
दाई ददा के थेभा,मया के ये पेटी।।

दाई ददा गीरगे ग,कान मे सुनत भार।
दउड़त आथे बेटी ह,बुता छोड़ ससुरार।।

दाई ददा के बेटी,कभु नी करे चारी।
तिर बइठ गोठियाय बर,इही ह संगवारी।।

                  संतोष साहू 
रसेला(छुरा) गरियाबंद छ0 ग0 
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