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क्यों रास रचाना भूल गये


तुम जाकर मथुरा हे कान्हा बंशी  को बजाना भूल गये।
राधा है तड़पती तेरे बिना क्यों रास रचाना भूल गये।।

तुम कह के गये थे आऊँगा फिर क्यूँ नहीं आये हे मोहन।
यमुना तट बंशी बजाऊँगा फिर क्यूँ न बुलाये ओ मोहन।
क्यों लौट के अब तक नआये उन वादों को क्यूँ भूल गये।।
राधा है तड़पती......


वो गोप ग्वाल रोते तुम बिन क्या तुम्हें याद नहीं आती है।
बंशी की तेरी धुन सुनने को वो गायें भी रंभाती है।
तृण चरना भी अब भूल गई  हे कान्हा कैसे भूल गये ।।
राधा है तड़पती........

मुरली की तान पर राधा तेरी दौड़ी दौड़ी आती थी।
अपने हाथों से ओ मोहन माखन तुझे खिलाती थी।
ओ निर्मोही तुम नेह लगा राधा को तड़पते छोड़ गये।।
राधा है तड़पती.....

गोपिन को आकर तो देखो फिरती हैं बावरी की तरह।
सुध बुध भूली रोती रहती अखिंयाँ  बरसे बदरी की तरह ।
बस एक बार तो आ जाओ  मईयाँ को कैसे भूल गये।
तुम जाकर मथुरा हे कान्हा बंशी को बजाना भूल गये।
राधा है तड़पती तेरे बिना क्यों रास रचाना भूल गये।।


                                                                                                                केवरा यदु"मीरा"
                                                                                                                  राजिम छ0ग0 
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