माँ की जैसी कोई नही माँ तो बस माँ होती है।
कुलदीपकों को रोशन करने को शमा होती है॥
माँ सभी की जगह ले लेती है इस जहान में।
पर माँ की जगह ले सके शक्ति नही भगवान में॥
विधाता सारी क्रियाएं करके जब हारा होगा।
तब सृष्टि में उसने एक माँ को अवतारा होगा॥
दसो दिशाएँ ढूंढॅ लो देखलो दुनिया ये गोल।
न पाओगे कहीं भी माँ जैसे नाता अनमोल॥
जिनकी गोदी में क्रीड़ा को आतुर रहे फरिश्ता।
जिन्हें जगमें आना हैं उन्हें चाहिए माँ का रिश्ता॥
अमृत की कहीं और धार नही इस संसार में।
जीवन पाते देखा हमने वात्सल्य की धार में॥
माँ त्यागमूर्ति है माँ से बड़ा न कोई भगवंत।
माँ ही संत जगत में और माँ ही आदि अनंत॥
माँ ममता दया करूणा वात्सल्य की खान है।
माँ मेरी नजरों में हमेशा ईश्वर से भी महान है॥
रचना:विरेन्द्र कुमार साहू
बोड़राबाँधा (पाण्डुका)
जिला गरियाबंद (छत्तीसगढ़)
